‘राम मंदिर चढ़ावा चोरी से भी नहीं जागी शर्म’, भ्रष्टाचार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी; दोषियों को मृत्युदंड की वकालत

प्रयागराज: भ्रष्टाचार को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि देश में ईमानदारी का स्तर इस हद तक गिर चुका है कि राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का विवाद भी लोगों को शर्मिंदा नहीं कर सका। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के दोषियों के लिए मृत्युदंड जैसे कठोर प्रावधान पर भी विचार किया जाना चाहिए।

भ्रष्टाचार पर न्यायालय की तीखी टिप्पणी

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने हमीरपुर के फैमुद्दीन और दो अन्य की याचिका पर सुनवाई के दौरान 51 पन्नों का अलग फैसला लिखते हुए कहा कि दशकों से भ्रष्टाचार को सामान्य मान लिया गया है। उन्होंने टिप्पणी की कि अब गलत वही माना जाता है, जो पकड़ा जाए। उनके अनुसार राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का विवाद ईमानदारी के सबसे निचले स्तर को दर्शाता है।

ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट का भी किया उल्लेख

अपने फैसले में न्यायमूर्ति ने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 182 देशों में भारत 91वें स्थान पर है, लेकिन यह स्थिति भी समाज को शर्मिंदा नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा कि यदि राम मंदिर के दान में कथित गड़बड़ी भी लोगों को विचलित नहीं करती, तो फिर उन्हें किसी भी बात से शर्म महसूस नहीं होगी।

अवैध निर्माण में अफसरों की भूमिका पर भी सवाल

अदालत ने कहा कि नगर निगम और अन्य प्राधिकरणों के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध निर्माण होते हैं। रिश्वत लेकर अधिकारी आंखें मूंद लेते हैं और जब कार्रवाई होती है तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण ढहाने के साथ-साथ इसमें शामिल दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

बुलडोजर कार्रवाई पर दिए अहम निर्देश

यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा था, जिनमें बुलडोजर कार्रवाई की आशंका जताते हुए सुरक्षा की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी आपराधिक मुकदमे के दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक आरोपी का घर ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति में तीन वर्ष या उससे अधिक समय से रह रहा है, तो ध्वस्तीकरण से कम से कम एक वर्ष पहले नोटिस दिया जाना चाहिए, ताकि वह वैकल्पिक व्यवस्था कर सके।

खंडपीठ के दोनों न्यायाधीशों में मतभेद

हालांकि इन निर्देशों पर खंडपीठ के दूसरे सदस्य न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन ने असहमति जताई। उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट दो वर्ष जैसी निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था का दुरुपयोग कर कार्रवाई से बचने के लिए लोग एफआईआर दर्ज करा सकते हैं। ध्वस्तीकरण से एक वर्ष पहले नोटिस देने के निर्देश पर भी उन्होंने सहमति नहीं जताई।

अब तीसरे न्यायाधीश के पास जाएगा मामला

दोनों न्यायाधीशों के बीच कानूनी बिंदुओं पर मतभेद होने के कारण यह मामला अब तीसरे न्यायाधीश को भेजा जाएगा, जो विवादित मुद्दों पर अंतिम राय देंगे।

 

Related posts